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जनसंख्या विस्फोट के लिए जिम्मेदार कौन?

नई दिल्ली। भारत अगले साल दुनिया में सबसे अधिक आबादी वाला देश बन जाएगा। जनसंख्या के मामले में यह चीन से आगे निकल जाएगा। जनसंख्या पर संयुक्त राष्ट्र की ताजा रिपोर्ट में यह बात कही गई है। इस बीच उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ का जनसंख्या पर बयान चर्चा में आ गया है. उन्होंने इशारों-इशारों में बढ़ती जनसंख्या का दोष एक वर्ग पर मढ़ दिया है। कल विश्व जनसंख्या दिवस पर यूपी के सीएम ने संकेत देते हुए कहा कि जनसंख्या नियंत्रण के प्रयास सफल होने चाहिए. लेकिन, इस बात का ध्यान रखना होगा कि कहीं भी जनसांख्यिकीय असंतुलन की स्थिति उत्पन्न न हो। ऐसा न हो कि किसी एक वर्ग की जनसंख्या में वृद्धि दर अधिक हो। योगी किस एक वर्ग की बात कर रहे थे, यह समझना मुश्किल नहीं है। देश में अक्सर हिंदुओं से ज्यादा मुसलमानों की आबादी पर ध्यान दिया जाता है। कभी-कभी इसका डर भी दिखाया जाता है। हालांकि, इस सच्चाई की परतों को समझने की जरूरत है। ऐसा न करने पर गलत निष्कर्ष निकल सकते हैं।
भारत में महिलाओं की कुल प्रजनन दर (टीएफआर) में गिरावट आई है। यह सभी धर्मों पर लागू होता है। टीएफआर यह बताता है कि एक महिला अपने पूरे जीवन में कितने बच्चों को जन्म देती है। यह तस्वीर राष्ट्रीय स्वास्थ्य परिवार सर्वेक्षण (एनएफएचएस) के चौथे और पांचवें सर्वेक्षण के बीच के आंकड़ों से स्पष्ट होती है। एनएफएचएस का चौथा सर्वेक्षण 2015-16 और पांचवां सर्वेक्षण 2019-21 में किया गया था। हाल ही में इसके आंकड़े जारी किए गए थे। इसमें एक और बड़ी तस्वीर साफ देखी गई. आंकड़े बताते हैं कि एनएफएचएस-4 और एनएफएचएस-5 के बीच मुसलमानों की प्रजनन दर सबसे ज्यादा 9.9 फीसदी घटी है। यह 2.62 से घटकर 2.36 पर आ गया। बेशक, यह अभी भी सभी धर्मों और समुदायों में सबसे ऊंचा है। लेकिन, यह दावा कि मुसलमानों की आबादी बढ़ रही है, सच नहीं है।

ये सर्वेक्षण 1992-93 से शुरू किए गए थे। तब से भारत के टीएफआर में 40 फीसदी की गिरावट आई है। यह 3.4 से घटकर 2.0 पर आ गया है। एक और आशंका का डर अक्सर सामने आता है। यानी आने वाले सालों में भारत में मुसलमानों की आबादी हिंदुओं से ज्यादा हो जाएगी. हालांकि इस दावे में भी कुछ ठोस नहीं है।
भारत में अब 100 करोड़ से ज्यादा हिंदू हैं। यह अनुमान 2020 के लिए है। इसका मतलब है कि आजादी के बाद हिंदुओं की आबादी में करीब 80 करोड़ का इजाफा हुआ। 1947 में देश में करीब 20 करोड़ हिंदू थे। जम्मू-कश्मीर, पंजाब, लक्षद्वीप और पूर्वोत्तर के 5 राज्यों को छोडक़र बाकी सभी राज्यों में हिंदू बहुसंख्यक हैं। कोई भी आधिकारिक आंकड़े यह संकेत नहीं देते हैं कि मुस्लिम आबादी कभी भी हिंदू आबादी से अधिक होगी। 1951 से 2020 तक औसतन हर साल हिंदुओं की आबादी में 1.14 करोड़ की वृद्धि हुई। दूसरी ओर, मुसलमानों की आबादी में औसत वार्षिक वृद्धि 2.5 मिलियन है। यह तब है जब मुसलमानों की जनसंख्या वृद्धि दर हिंदुओं की तुलना में दोगुनी है।
यहां सीएम योगी की चिंता को नजरंदाज करना ठीक नहीं होगा। योगी के राज्य में एक महिला औसतन 3.15 बच्चों को जन्म देती है। इसमें से हिंदू महिलाओं के औसतन 3.06 बच्चे हैं। इसकी तुलना में एक मुस्लिम महिला 3.6 बच्चों को जन्म देती है। राज्य में 44.2 प्रतिशत महिलाएं वे हैं जिनके 2 या उससे कम बच्चे हैं। दो या उससे कम बच्चों वाली महिलाओं में 44.85 प्रतिशत हिंदू महिलाएं हैं। वहीं इस घेरे में 40.38 फीसदी मुस्लिम महिलाएं हैं. सीएम योगी के बयान को इसी संदर्भ में देखा जाना चाहिए।
जनसंख्या के आंकड़े स्पष्ट रूप से दिखाते हैं कि कोई अपने हाथों पर हाथ रखकर नहीं बैठ सकता है। मेरा और तुम्हारा करने से काम नहीं चलेगा। इस साल दुनिया की आबादी 8 अरब तक पहुंच जाएगी। वहीं, अगले साल भारत चीन को पछाडक़र सबसे अधिक आबादी वाला देश बन जाएगा। समस्या आबादी नहीं है। चुनौती यह है कि इतनी बड़ी आबादी को गुणवत्तापूर्ण जीवन कैसे प्रदान किया जाए। इस चुनौती से मिलकर ही निपटा जा सकता है। इसके लिए कोई दूसरा फॉर्मूला नहीं है। अब फोकस इस बात पर हो गया है कि हम गरीबी को कितना कम कर सकते हैं। कितने लोगों को रोजगार दिया जा सकता है? कितने लोगों को स्वास्थ्य सुविधा के दायरे में लाया जा सकता है?

 

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