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यूं ही नहीं बन गए मुलायम समाजवादी आंदोलन के सबसे प्रखर योद्धा

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लखनऊ। नहीं रहे नेताजी.. कहने को तो पिछड़े, दलित, वंचितों के नेता थे, लेकिन सबके अपने थे नेताजी.. कौन कह सकता है कि वो सिर्फ यादवों और मुसलमानों के नेता थे.. बात सरसठ की है, जब यूपी में पहली बार गैर-कांग्रेसी सरकार बनी थी. तब एक दलित की मां को निर्वस्त्र कर लॉक अप में रखने की घटना की जानकारी मिली तो खून खौल उठा था नेताजी का..ऐलान कर दिया कि कमज़ोरों को सताने की इज़ाजत नहीं किसी को, ना अपनों को, नाही गैरों को. थाने को घेराव किया, गोलियां चलीं, कुछ लोग जख्मी भी हुए और नेताजी को तीन माह का कारावास मिला. इस तरह से प्रारंभ हुआ था समाजवादी आंदोलन के सबसे प्रखर योद्धा का सफर…
बात उन दिनों की है जब मेनपुरी,इटावा और आसपास के इलाकों में नहर रेट के विरोध में आंदोलन करने पहुंचे थे लोहियाजी. तब चौदह बरस की उम्र में मुलायम ने जिद कर अपनी भी गिरफ्तारी दी थी. अ_ाइस बरस की उम्र में ही सियासत के सूरमा लाखन सिंह को चरखा दांव से पटखनी देकर विधानसभा पहुंचे थे वो.

राजनीति में उभरते इस योद्धा की शोहरत से डर कर राजनीति के रथियों ने मिल कर उनहत्तर के चुनाव में हरवा दिया था. जवाब में मुलायम अगले चार बरस में प्रदेश के हर गांव-चौपाल की चारपाई पर चर्चा करने पहुंच चुके थे. अपने अखाड़े में मुलायम ने कभी शिकस्त नहीं मानीं, चाहे दंगल हो या राजनीति की रणभूमि.. अपने से ताकतवर को धूल चटा देने में महारत हासिल करने की वजह से सियासत में उनके उस्ताद रहे नत्थू सिंह ने अपनी सीट दे कर अपना वारिस बना दिया.. इसी साल लोहियाजी ने दुनिया से विदा ले ली. और मुलायम उनकी राजनीतिक विचारधारा के भी वारिस हो गए. नेताजी ने तब सबको साथ लेकर जनता दल का गठन किया.
ये वही दौर था जिसमें इंदिरा ने गरीबी हटाओ जैसे पॉपुलर नारे से समाजवादी आंदोलन को बेमानी कर दिया था. मुलायम ने आपातकाल का विरोध किया, उन्नीस महीनें जेल में काटे. मगर मूल्यों से समझौता ना किया. एक नोट-एक वोट मांग कर उसूलों की सियासत की. इमरजेंसी हटने पर यूपी में फिर गैर कांग्रेसी सरकार बनीं. तब पहली बार मंत्री बने मुलायम सिंह. सहकारिता आंदोलन को खड़ा कर उन्होंने अपनी साख इतनी मजबूत कर ली कि चौधरी चरण सिंह को भी उनकी ज़रूरत महसूस हुई. सन 85 में 85 सीटें लोकदल की जिता कर लाए थे मुलायम. ज़मीन पर पकड़ इतनी मजबूत कि धरती पुत्र कहलाए मुलायम. इसी साल निकाला उत्तर प्रदेश में क्रांति रथ.. जिसमें कर्नाटक से हेगड़े, केरल से नंबूदिरीपाद, युवा तुर्क चंद्रशेखर, राजेश्वर रॉव जैसे कद्दावर नेताओं ने की थी शिरकत..सही मायने में कांग्रेस के भ्रष्टाचारी चरित्र के खिलाफ समाजवादी आंदोलन का बिगुल मुलायम ने फूंका था. और सच तो ये है कि जनता दल और जनमोर्चा की नींव तो उसी दिन पड़ गई थी. जिस पर नब्बे की शुरुआत में बोफोर्स घोटाले को लेकर राजा मांडा वीपी सिंह ने सियासी महल खड़ा किया था. अजित सिंह की बढ़ती महत्वाकांक्षा देख कर मुलायम ने अपना अलग रास्ता चुना. और यूपी के चीफ मिनिस्टर बने पहली बार.
अब वो सियासत में चरखा दांव की अहमियत समझ चुके थे. बीजेपी और मायावती के भाई-बहन का गठबंधन नहीं चला. तो बागियों और निर्दलीयों को साथ लेकर तीसरी बार मुख्यमंत्री बनें. लेकिन यदुकुल प्रधान राजनीति ने उन्हें अगली बार सत्ता से बेदखल कर दिया. मायावती सत्ता में आईं ज़रूर, मगर जनता के लिए मुलायम ही नेताजी रहे. 2012 में बहुमत से समाजवादी पार्टी ने सरकार बनाई. इस बार मुलायम ने टीपू को सुल्तान बनाया. इसके बाद राजनीति के नेपथ्य में ही रहे नेताजी. ज्यादातर वक्त सियासत की विरासत को लेकर होने वाली कलह शांत करने में गुजरा. सेहत ने भी साथ देना बंद कर दिया. मौत भी उन्हें छीनने के लिए कई दिनों तक लड़ती रही, और एक दिन धरतीपुत्र अमर हो गया. देश की राजनीति में पिछड़ों, दलितों और वंचितों की आवाज़ हमेशा के लिए खामोश हो गई. लेकिन कानों में अब तक गूंजता है वो नारा- जिसका जलवा कायम है, उसका नाम मुलायम है..

 

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