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मोदी का यह सपना हुआ पूरा

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नई दिल्ली। गोवा में कांग्रेस के 11 विधायकों में 10 बीजेपी में शामिल हो सकते हैं। माना जा रहा है कि गोवा कांग्रेस में टूट की औपचारिक घोषणा ही बाकी है, तैयारियां पूरी हो चुकी हैं। इससे पहले महाराष्ट्र में शिवसेना दो हिस्सों में बंट चुकी है। मजे की बात है कि एकनाथ शिंदे का बगावती गुट ही सरकार में आ गया। महाराष्ट्र की नई सरकार में बीजेपी भी शामिल है। बहरहाल, इसमें कोई दो राय नहीं कि गोवा हो या महाराष्ट्र, दोनों ही राज्यों में विपक्षी दलों में फूट के बड़े कारणों में एक बीजेपी भी है। अब तो यह कहा जाने लगा है कि बीजेपी की नजर उन सभी राज्यों पर है जहां उसे क्षेत्रीय दलों से कड़ी चुनौती मिलती है। एक्सपर्ट्स की मानें तो बीजेपी अब कांग्रेस मुक्त नहीं, विपक्ष मुक्त भारत की नई रणनीति पर आगे तेजी से आगे बढ़ रही है।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी इसी वर्ष 10 फरवरी को गोवा में एक सभा को संबोधित कर रहे थे। तब मोदी ने अपना पुराना भाषण याद किया जिसमें उन्होंने पहली बार ‘कांग्रेस मुक्त भारत’ का नारा दिया था। उन्होंने कहा कि गोवा की धरती पर ही उनके मुंह से सहसा कांग्रेस मुक्त भारत का नारा निकल गया और आज यह नारा देश को करोड़ों नागरिकों का संकल्प बन गया है। आज हाल यह है कि कांग्रेस की सिर्फ दो राज्यों- राजस्थान और छत्तीसगढ़ में अपनी सरकारें हैं। इसके इतर, झारखंड की सरकार में वह शामिल है। महाराष्ट्र में शिवसेना और एनसीपी के साथ महाविकास अघाड़ी सरकार में शामिल थी जिसका शिवसेना में फूट के साथ सफाया हो गया है।
राज्यों में कांग्रेस की दुर्दशा का अंदाजा तो इस बात से लगाया जा सकता है कि पंजाब की सत्ता में रहते हुए भी पिछले चुनाव में बुरी तरह पराजित हुई। उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में कांग्रेस पार्टी की 97त्न सीटों पर जमानत जब्त हो गई। उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, पंजाब, गोवा और मणिपुर में हुए विधानसभा चुनावों का ब्योरा देते हुए केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने लोकसभा में कहा था कि कांग्रेस पार्टी इन राज्यों की 575 सीटों पर चुनाव लड़ी और 475 सीटों पर उनके प्रत्याशियों की जमानत जब्त हो गई।

लोकसभा चुनावों के लिहाज से भी कांग्रेस की हालत जर्जर ही दिखती है। 2014 के आम चुनावों में कांग्रेस पार्टी को सिर्फ 44 सीटें मिली थीं और अगली बार 2019 के लोकसभा चुनाव में उसके 52 सांसद चुने गए। 1947 में देश की आजादी के वक्त से लगातार सत्ता में रही कांग्रेस का यह हाल, पार्टी की दुर्दशा ही मानी जाएगी। यहां तक कि पार्टी के पूर्व अध्यक्ष राहुल गांधी ही उत्तर प्रदेश की अपनी परंपरागत अमेठी सीट हार गए। उन्होंने केरल के वायनाड से भी चुनाव लड़ा था जहां से उन्हें जीत मिली और वो लोकसभा पहुंच सके। कांग्रेस के राज्यसभा सांसदों की संख्या भी 31 के आंकड़े तक सीमित हो गई है जबकि बीजेपी का आंकड़ा 90 के पार चला गया है।
कुल मिलाकर कहा जा सकता है कि देश की राजनीति में कांग्रेस पार्टी लगभग निष्प्रभावी हो गई है। यही कारण है कि बीजेपी की नजर अब क्षेत्रीय वंशवादी दलों पर है। हाल ही में हैदराबाद में हुई पार्टी की राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने वंशवाद को लोकतांत्रिक राजनीति के लिए अभिशाप बताया है। पीएम मोदी के साथ-साथ पूरी बीजेपी वंशवादी राजनीति पर लगातार हमले करती रहती है। इसके पीछे रणनीति यह है कि वंशवाद के विरोध की आड़ में ताकतवर प्रतिस्पर्धियों का राज्य दर राज्य सफाया कर दिया जाए। महाराष्ट्र में बालासाहेब ठाकरे की शिवसेना को उनके पुत्र उद्धव ठाकरे के हाथ से छीनने की कोशिश भी इसी रणनीति की एक कड़ी माना जा सकता है।
सोशल मीडिया पर उन क्षेत्रीय दलों के नाम गिनाए जा रहे हैं जिनसे कोई ना कोई धड़ा अलग हुआ है। सोमवार को एआईएडीएमके ने अपने दिग्गज नेता और तमिलनाडु के पूर्व मुख्यमंत्री ओ पन्निरसेल्वम को कोषाध्यक्ष पद से हटाकर पार्टी की प्राथमिक सदस्यता भी छीन ली। इस कारण पार्टी का एक धड़ा इडापड्डी के पलानीस्वामी जबकि पन्नीरसेल्वम की अगुवाई में दूसरा धड़ा तैयार हो चुका है। इस मौके पर सोशल मीडिया पर चर्चा होने लगी कि बीजेपी के साथ गठबंधन में रही पार्टियों में फूट पडऩे की परंपरा बन और बढ़ रही है। एक सोशल मिडिया पोस्ट में कहा गया है, एलजेपी, पीडीपी, शिवसेना, टीडीपी, जेडीयू, आजसू, अकाली दल, राजभर, अपना दल के बाद अब एआईडीएमके भी दो भाग में बंट गया। ये सभी कभी ना कभी बीजेपी के साथ गठबंधन में थे।
कहा जा रहा है कि बीजेपी को गोवा को विपक्ष मुक्त करने में जल्द ही सफलता मिल जाएगी। उसके बाद बीजेपी की चाहत होगी कि गुजरात, हिमाचल प्रदेश, झारखंड, उत्तर प्रदेश, बिहार, हरियाणा और कर्नाटक जैसे राज्यों से भी विपक्ष का सफाया हो जाए। जिन राज्यों में कांग्रेस मुख्य प्रतिस्पर्धी पार्टी है, वहां तो बीजेपी को बहुत चिंता नहीं है, लेकिन वंशवाद की धुरी पर टिकीं क्षेत्रीय पार्टियां उसके लिए ज्यादा चुनौतीपूर्ण साबित हो रही हैं। ऐसे में शिवसेना जैसी बगावत ही उन पार्टियों को अंदर से कमजोर कर सकती है। इसलिए चाहे बिहार की आरजेडी हो या झारखंड की झामुमो, उत्तर प्रदेश की सपा हो या महाराष्ट्र की एनसीपी… इन सभी के वंशवादी नेतृत्व से इतर तेज-तर्रार और दमदार नेताओं की तलाश हो रही है जो एकनाथ शिंदे जैसी आंधी लाकर पार्टी की नैया डुबो सकते हैं।
बीजेपी के क्रिया-कलापों पर करीबी नजर रखने वालों की मानें तो पार्टी अभी अपना फोकस गुजरात, हिमाचल प्रदेश जैसे राज्यों पर रख रही है जहां विधानसभा चुनाव होने वाले हैं। बिहार में वह जेडीयू के साथ वह सत्ता में है, लेकिन उसके ज्यादा विधायक होने के बावजूद मुख्यमंत्री के रूप में नीतिश कुमार को ही स्वीकार करना पड़ा है। वहां दूसरी चुनौती लालू प्रसाद यादव की आरजेडी है जिसमें दरार लाने के कारक मौजूद हैं। अगर आरजेडी और जेडीयू के अंदर बगावत हो जाए तो बीजेपी के लिए विपक्ष मुक्त बिहार का सपना पूरा सकता है। इसी तरह, झारखंड में शिबू सोरेन की पार्टी झाखंड मुक्ति मोर्चा (छ्वरूरू) भी राज्य की जनता के लिए एक विकल्प बन जाती है। उत्तर प्रदेश में मुलायम सिंह यादव की स्थापित समाजवादी पार्टी की कमान अब उनके पुत्र अखिलेश यादव के हाथों में है। वहां अखिलेश के सौतेले भाई प्रतीक यादव की पत्नी अपर्णा यादव बीजेपी में जा चुकी हैं।
कुल मिलाकर कहें तो बीजेपी विपक्ष मुक्त भारत के लिए दो रणनीति पर आगे बढ़ती दिखाई दे रही है। पहला- जहां कांग्रेस मुख्य विपक्षी दल है, वहां विधायकों को तोड़ो और जहां क्षेत्रीय दल हैं, वहां वंशवादी नेतृत्व के खिलाफ महत्वाकांक्षी नेताओं के सपनों को हवा दो। वंशवादी पार्टियों की कमजोरी यह है कि उनका कमान अब संस्थापकों की दूसरी या तीसरी पीढ़ी के पास है जिनमें अपने पूर्वजों जैसा राजनीतिक कौशल नहीं है। आरजेडी, सपा, झामुमो जैसी पार्टियां इसकी शानदार मिसाल हैं। महाराष्ट्र की एनसीपी अभी शरद पवार के हाथों में ही है, लेकिन भतीजे अजित पवार की महत्वाकांक्षा ढाई वर्ष पहले जगी तो बीजेपी के साथ आ गए और अहले सुबह ही डिप्टी सीएम का शपथ ले लिया। ऐसी महत्वाकांक्षा तो किसी की भी हो सकती है। बीजेपी इस बात से अच्छे से वाकिफ है। इसलिए कहा जा रहा है कि अब जिस किसी में महत्वाकांक्षा के साथ-साथ ताकत का संयोग मिल जाए, उसके कंधे पर बीजेपी का हाथ रहेगा। कुल मिलाकर कहा जा सकता है- ऑपरेशन कमल चालू आहे…

 

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