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नहीं कम हो रही कांग्रेस की टेंशन

नई दिल्ली। कांग्रेस में नई जान फूंकने लिए मई के महीने में राजस्थान के उदयपुर में चिंतन शिविर का आयोजन होता है। चिंतन शिविर को बीते दो महीने हो गए हैं लेकिन ऐसा लगता है कि कांग्रेस की चिंता हर दिन बढ़ जाती है। इस चिंतन शिविर के बाद से ही कई ऐसी खबरें आई हैं जिसको देखकर कहा जा सकता है कि पार्टी एक संकट से निकलने की अभी कोशिश कर ही रही होती है तब तक दूसरी परेशानी से घिर जाती है। महाराष्ट्र में अभी गठबंधन की सरकार गई जिसमें कांग्रेस भी थी, इस बात को कुछ ही दिन हुए कि गोवा कांग्रेस में एक बड़ी फूट की खबर सामने आती है। कांग्रेस के हाथ से पहले ही कई राज्यों से सत्ता जा चुकी है और अब जिन राज्यों में उसके विधायक हैं उनको साथ बनाए रखना भी पार्टी के लिए एक बड़ी चुनौती है। विपक्ष के जो दूसरे दल हैं वो भी इसको लेकर कांग्रेस पर निशाना साध रहे हैं। हालांकि इस संकट से निकलने के लिए कांग्रेस की ओर से जो प्रयास किए जा रहे हैं उस पर भी सवालिया निशान है। वजह है कि अब तक कई राज्यों में पार्टी का पूर्णकालिक प्रदेश अध्यक्ष भी नहीं है।महाराष्ट्र के बाद पड़ोसी राज्य गोवा में सियासी हलचल तेज हो गई है। रविवार खबर आती है कि कांग्रेस पार्टी में एक बड़ी फूट हो गई है। सोमवार कांग्रेस की ओर से गोवा विधानसभा स्पीकर से अपने विधायक माइकल लोबो और दिगंबर कामत को अयोग्य ठहराने की मांग की जाती है। माइकल लोबो विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष भी थे जिन्हें कांग्रेस ने अब हटा दिया है। 5 महीने पहले ही राज्य में चुनाव हुए और इन पांच महीनों के भीतर ही कांग्रेस की ओर से कहा जा रहा है कि उसके 5 विधायकों से संपर्क नहीं हो पा रहा है। गोवा में पहले भी कांग्रेस विधायक पाला बदलकर बीजेपी में शामिल हो चुके हैं। गत विधानसभा चुनाव में यह मुद्दा भी खूब उठा था।
कांग्रेस को इस बात का अंदेशा था और ऐसी खबरें भी आ रही थीं फिर भी न जाने क्यों कांग्रेस आलाकमान ने इंतजार किया। जब मामला काफी आगे बढ़ गया तब कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी की ओर से पार्टी के वरिष्ठ नेता मुकुल वासनिक को पणजी भेजने का फैसला होता है। अब कांग्रेस नेताओं की ओर से कहा जा रहा है कि ऐसी जानकारी थी कि भाजपा कांग्रेस विधायकों को अपने पाले में लाने की योजना बना रही है। दिगंबर कामत के दिल्ली में अमित शाह से मिलने की अफवाहें सुनी थीं। जब ऐसा था उसके बाद भी कांग्रेस आखिर किस बात का इंतजार कर रही थी। वहीं कांग्रेस के उस फैसले पर भी सवाल खड़े हो रहे हैं कि चुनाव से ठीक पहले पार्टी में शामिल हुए माइकल लोबो को नेता प्रतिपक्ष कैसे बना दिए। लोबो इसी साल बीजेपी छोडक़र कांग्रेस में शामिल हुए थे। अब राज्य के नेताओं की ओर से कहा जा रहा है कि आप ऐसे व्यक्ति को कैसे नियुक्त कर सकते हैं जो अभी-अभी पार्टी में शामिल हुआ है। इससे कार्यकर्ताओं के बीच क्या संदेश जाएगा।
चिंतन शिविर के बीच ही पंजाब के वरिष्ठ नेता सुनील जाखड़ ने पार्टी से इस्तीफा दे दिया। पार्टी के लिए अगला बड़ा झटका गुजरात था जहां विधानसभा चुनाव होने वाले हैं। यहां हार्दिक पटेल बीजेपी में शामिल हो जाते हैं। उसके बाद अगली हाई-प्रोफाइल निकासी कपिल सिब्बल की थी। वो सपा के टिकट पर राज्यसभा पहुंचते हैं। उसके बाद कर्नाटक में ब्रजेश कलप्पा पार्टी छोड़ते हैं। परेशानी यहीं कम नहीं होती चिंतन शिविर के बाद हरियाणा में कांग्रेस उम्मीदवार अजय माकन क्रॉस वोटिंग के कारण राज्यसभा चुनाव हार गए। महाराष्ट्र में भी कांग्रेस में हडक़ंप मच गया है। गठबंधन की सरकार तो चली गई है लेकिन कई विधायक ऐन मौके पर गैरहाजिर रहे जिससे टेंशन यहां भी कम नहीं। यहां अभी कार्रवाई भी नहीं हुई है कि अगला नंबर गोवा का आ गया।
कांग्रेस के प्रदर्शन को लेकर सवाल तो हैं ही लेकिन कई महत्वपूर्ण पद खाली हैं। इस पर भी सवाल खड़े होते रहते हैं। पार्टी का राष्ट्रीय अध्यक्ष अगला कौन होगा इस पर अभी तस्वीर साफ नहीं है लेकिन इन राज्यों का भी हाल देखिए। पश्चिम बंगाल का ही मामला लें। चुनाव के बाद से लेकर अब तक राज्य के लिए पूर्णकालिक प्रभारी नियुक्त नहीं किया गया है। सियासत के लिहाज से महत्वपूर्ण माने जाने वाले उत्तर प्रदेश और बिहार राज्य में में अभी तक एक नए पीसीसी प्रमुख की नियुक्ति नहीं हुई है। मई के महीने उदयपुर में चिंतन शिविर में पार्टी मे नई जान फूंकने की बात होती है लेकिन ऐसा अब तक दिख नहीं रहा है।
कांग्रेस नेताओं को डर है कि महाराष्ट्र और गोवा वाली परेशानी झारखंड में आ सकती है। जहां वह झामुमो के साथ सरकार में है। बीच-बीच में खबर आती है कि झामुमो गठबंधन से बाहर निकल सकता है और भाजपा के साथ हाथ मिला सकता है। वे पहले भी ऐसा कर चुके हैं। राज्यसभा चुनाव में कांग्रेस को आंख दिखाते हुए हेमंत सोरेन की ओर से एकतरफा उम्मीदवार की घोषणा की जाती है। वहीं राष्ट्रपति चुनाव में भी ऐसी खबर है कि झामुमो एनडीए उम्मीदवार का समर्थन कर सकता है। कांग्रेस विधायकों के बीच भी एक दूसरे को लेकर संदेह है। एक गुट के नेता दूसरे गुट को संदेह की नजर से देखते हैं।

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