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लखनऊ,(मॉडर्न ब्यूरोक्रेसी न्यूज)ः विश्व आघात दिवस (वर्ल्ड ट्रॉमा डे) के अवसर पर 17 अक्टूबर को एसजीपीजीआई के एपेक्स ट्रॉमा सेंटर में सड़क सुरक्षा जागरूकता पर एक जन जागरूकता कार्यक्रम आयोजित किया गया। इस कार्यक्रम का आयोजन एपेक्स ट्रॉमा सेंटर के फैकल्टी और स्टाफ द्वारा किया गया था, जिसका उद्देश्य आम जनता के बीच सड़क दुर्घटनाओं की रोकथाम, प्राथमिक चिकित्सा (फर्स्ट एड) के महत्व और सड़कों पर जिम्मेदार व्यवहार के बारे में जागरूकता फैलाना था। इस कार्यक्रम में 170 से अधिक आम लोगों ने भाग लिया।
कार्यक्रम में डॉक्टर रुपाली ने विश्व आघात दिवस के महत्व पर प्रकाश डाला गया। उनहोने इस बात पर जोर दिया कि युवाओं में मृत्यु और विकलांगता के प्रमुख कारणों में ट्रॉमा (गंभीर चोट) एक है, और अधिकांश सड़क दुर्घटनाओं को रोका जा सकता है। ट्रॉमा की रोकथाम और त्वरित प्रतिक्रिया (तेज व शीघ्र रिस्पॉन्स) में आम जनता की भागीदारी की आवश्यकता पर विशेष बल दिया गया। एसजीपीजीआई के निदेशक पद्मश्री प्रो. आर. के. धीमन ने ट्रॉमा मैनेजमेंट मेंगोल्डन आवर के महत्व पर बात की। उन्होंने कहा, अस्पताल पहुँचने से पहले दी जाने वाली देखभाल और शुरुआती पुनर्जीवन से कई जानें बचाई जा सकती है। कार्यक्रम का वैज्ञानिक सत्र रोड साइड फर्स्ट रिस्पोंडर (दुर्घटना स्थल पर सबसे पहले मदद करने वाले) विषय पर था। जिसमें डॉक्टर अमित ने बताया कि कैसे एक आम व्यक्ति दुर्घटना स्थल पर किसी की जान बचा सकता है। इसमें गोल्डन आवर की अवधारणा, दुर्घटना स्थल को सुरक्षित करना, आपातकालीन नंबर 108 पर कॉल करना, सीधे दबाव डालकर बाहरी रक्तस्राव को रोकना, रीढ़ की हड्डी की चोट से बचाने के लिए पीड़ित को सही तरीके से स्थानांतरित करना, और दुर्घटना स्थल पर क्या नहीं करना चाहिए। इन सभी विषयों पर व्यावहारिक प्रदर्शन (प्रैक्टिकल डेमोंस्ट्रेशन) के साथ विस्तार से चर्चा की गई।
कान, नाक, गले और चेहरे की चोटों का प्रबंधन
दूसरा और तीसरा सत्र “चेहरे पर खून? घबराएं नहीं – कान, नाक, गले और चेहरे की चोटों का प्रबंधन” विषय पर केंद्रित था। डाक्टरों ने बताया कि चेहरे और नाक से होने वाले खून बहने को कैसे संभालें, चेहरे की चोटों और जबड़े की हड्डी टूटने (फ्रैक्चर) पर क्या करें, और कब तुरंत अस्पताल जाना चाहिए। उदाहरणों के जरिए इस बात पर जोर दिया गया कि घबराना नहीं चाहिए और खून बहने को रोकने के लिए कुछ आसान कदम उठाने चाहिए।
अगला सत्र एक बहुत ही महत्वपूर्ण लेकिन अक्सर अनदेखे किए जाने वाले विषय पर था – “अदृश्य घाव – पोस्ट ट्रॉमेटिक स्ट्रेस डिसऑर्डर । जिसमें बताया गया कि सड़क दुर्घटनाओं से न केवल शारीरिक चोटें आती हैं, बल्कि पीड़ितों और उनके परिवार वालों को गहरा मानसिक आघात भी पहुंचता है। इसमें बुरे सपने आना, पुरानी घटनाओं की यादें बार-बार आना (फ्लैशबैक), घबराहट, चिड़चिड़ापन और दोबारा सफर करने से डर लगना जैसे लक्षणों पर चर्चा की गई। साथ ही, मनोवैज्ञानिक परामर्श, परिवार के सहयोग और समय पर मनोरोग विशेषज्ञ की मदद लेने की जरूरत पर जोर दिया गया।
आखिरी सत्र “किसी के लिए चमत्कार बनें – अंगदान” विषय पर था। डॉक्टर सुरूचि ने गंभीर सिर की चोट के बाद होने वाली ‘ब्रेन डेथ’ के बारे में बताया और समझाया कि कैसे अंगदान से आठ लोगों की जान बचाई जा सकती है। अंगदान से जुड़ी आम गलतफहमियों और शंकाओं को दूर किया गया और लोगों को अंगदान का संकल्प लेने के लिए प्रेरित किया गया। वहीं प्रतिभागियों ने हेलमेट, सीट बेल्ट, बच्चों की सुरक्षा वाली सीटों, गति सीमा (स्पीड लिमिट), शराब पीकर गाड़ी चलाने और गाड़ी चलाते समय मोबाइल फोन के इस्तेमाल जैसे विषयों पर कई सवाल पूछे, जिनका विशेषज्ञों ने जवाब दिया। कार्यक्रम के आयोजकों ने सहयोग के लिए निदेशक, डीन और सभी संबंधित विभागों का आभार व्यक्त किया। कार्यक्रम के अंत में सभी ने सड़क सुरक्षा का संकल्प लिया। सभी 170 प्रतिभागियों ने एक साथ खड़े होकर यह शपथ ली कि वे दोपहिया वाहन चलाते समय हमेशा हेलमेट पहनेंगे और चार पहिया वाहन चलाते समय सीट बेल्ट का उपयोग करेंगे, कभी भी शराब पीकर गाड़ी नहीं चलाएंगे, गाड़ी चलाते समय मोबाइल फोन का इस्तेमाल नहीं करेंगे, हमेशा यातायात नियमों और गति सीमा का पालन करेंगे, सड़क दुर्घटना के पीड़ितों की मदद करेंगे और उन्हें प्राथमिक उपचार (फर्स्ट एड) देंगे तथा अपने परिवार और समुदाय में सड़क सुरक्षा और अंगदान के बारे में जागरूकता फैलाएंगे। यह संकल्प सड़कों को सुरक्षित बनाने और अनमोल जीवन बचाने के प्रति एक मजबूत प्रतिबद्धता को दर्शाता है।
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