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क्या आजमगढ़ दोहराएगा इतिहास

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लखनऊ। उत्तर प्रदेश में दो लोकसभा सीटों पर उपचुनाव है. आजमगढ़ और रामपुर लोकसभा सीटें क्रमश: सपा मुखिया अखिलेश यादव और आजम खान के इस्तीफे से रिक्त हुई है. यहां आजमगढ़ लोकसभा उपचुनाव की चर्चा कर रहे हैं. जहां दिन-प्रतिदिन राजनीतिक समीकरण बदल रहे हैं. भाजपा ने यहां से लोकगायक दिनेश लाल यादव उर्फ निरहुआ, सपा ने धर्मेंद्र यादव और बसपा ने गुड्डू जमाली को अपना उम्मीदवार बनाया है. आजमगढ़ में मतदान 23 जून को होगा. सपा और भाजपा दोनों अपनी जीत का दावा कर रहे हैं. लेकिन मतदान के चंद दिनों पहले मौलवी आमिर रशादी मदनी के राजनीतिक संगठन राष्ट्रीय उलेमा परिषद ने बहुजन समाज पार्टी के उम्मीदवार शाह आलम उर्फ गुड्डू जमाली को समर्थन देकर आजमगढ़ संसदीय सीट के उपचुनाव को दिलचस्प बना दिया है.
आजमगढ़ को समाजवादी पार्टी अपने मजबूत गढ़ के रूप में देखती है. तभी तो सपा संरक्षक मुलायम सिंह यादव ने 2017 में आजमगढ़ से चुनाव लड़े और जीते. 2019 में अखिलेश यादव भी आजमगढ़ से विजयी हुए. आजमगढ़ अक्सर राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा में रहता है. पूर्वांचल का यह जिला अपने बागी तेवरों के लिए जाना जाता है. आपातकाल के बाद यह जिला तब चर्चा में आया था जब 1978 में आजमगढ़ संसदीय क्षेत्र के लिए हो रहे उपचुनाव में एक तरफ कांग्रेस की प्रत्याशी मोहसिना किदवई चुनाव मैदान में थी. तो वहीं दूसरी तरफ जनता पार्टी ने राम बचन यादव को अपना उम्मीदवार बनाया था.
आपातकाल के बाद हुए चुनाव में उत्तर प्रदेश से लेकर केंद्र तक जनता पार्टी की सरकार बनी. उस दौर में हुए चुनावों में उत्तर प्रदेश में कांग्रेस को एक भी सीट पर जीत नहीं मिली. एक बार तो इंदिरा गांधी ने आजमगढ़ सीट पर हो रहे उपचुनाव में अपना उम्मीदवार ना खड़ा करने का एलान किया था. पार्टी के पुनर्निर्माण पर जोर दिया लेकिन अचानक में उन्हें ऐसी सनक लगी. उन्होंने आजमगढ़ सीट पर अपना प्रत्याशी ही नहीं खड़ा किया बल्कि खुद चुनाव मैदान में इस सीट को जीतने के लिए उतर पड़ी. दरअसल, 1977 में हुए चुनाव में जनता पार्टी को पूर्ण बहुमत मिला. आजमगढ़ की रहने वाले राम नरेश यादव राज्य के मुख्यमंत्री बन गए. इससे पहले वह लोकसभा चुनाव में आजमगढ़ सीट से ही सांसद चुने गए थे. लेकिन मुख्यमंत्री बनने के बाद उन्होंनेन्हों लोकसभा सीट छोड़ दी थी.
बाराबंकी की रहने वाली अपनी विश्वसनीय सहयोगी मोहसिना किदवई को चुनाव मैदान में उतार दिया. आज से 44 साल पहले आजमगढ़ सीट के लिए हो रहे उपचुनाव में एक तरफ उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री राम नरेश यादव का गृह क्षेत्र था तो वहीं दूसरी तरफ पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की प्रतिष्ठा दांव पर लग गई.
चौधरी चरण सिंह उन दिनों देश के गृह मंत्री थे. इंदिरा गांधी का चौधरी चरण सिंह एक दूसरे के कट्टर प्रतिद्वंदी थे. आजमगढ़ लोक सभा सीट पर हो रहे उपचुनाव पर जीत के लिए इंदिरा गांधी और चौधरी चरण सिंह की प्रतिष्ठा दांव पर लग चुकी थी. केंद्र औऱ राज्य सरकार ने चुनाव जीतने के लिए सरकारी मशीनरी का जमकर इस्तेमाल किया, लेकिन जीत कांग्रेस की हुई. आजमगढ़ संसदीय क्षेत्र का उपचुनाव कांग्रेस के लिए संजीवनी साबित हुई. और सत्ता पक्ष के लिए अपमान का कारण बना. ऐसे मे ंसवाल उठता है कि क्या एक बार फिर आजमगढ़ अपना इतिहास दोहराने जा रहा है?
आजमगढ़ संसदीय सीट पर मौलवी आमिर रशादी मदनीने बहुजन समाज पार्टी के उम्मीदवार शाह आलम उर्फ ??गुड्डू जमाली को समर्थन दिया है.पर्यवेक्षकों का कहना है कि त्रिकोणीय मुकाबले के साथ समाजवादी पार्टी को सीट बरकरार रखना मुश्किल हो सकता है क्योंकि भारतीय जनता पार्टी ने एक बार फिर भोजपुरी गायक दिनेश लाल यादव ‘निरहुआ’ को सपा के धर्मेंद्र यादव से मुकाबला करने के लिए मैदान में उतारा है.
राष्ट्रीय उलेमा परिषद का समर्थन मिलने के बाद जमाली ने दावा किया है कि अब उनकी जीत तय है. इसके पीछे मुख्य कारण सदर, मुबारकपुर और गोपालपुर विधानसभा सीटों पर राष्ट्रीय उलेमा परिषद का दबदबा बताया जा रहा है जो आजमगढ़ संसदीय क्षेत्र का हिस्सा हैं. 2017 के यूपी विधानसभा चुनाव में, बसपा राष्ट्रीय उलमा परिषद के समर्थन से चार सीटें जीतने में सफल रही थी.
आजमगढ़ जिले में लोकसभा उपचुनाव के लिए मतदान 23 जून को होगा और इस मुकाबले में शामिल सभी राजनीतिक दल जीत के लिए कड़ी मेहनत कर रहे हैं.दो दिन पहले सपा के संस्थापक सदस्य और पूर्व विधायक राम दर्शन यादव भाजपा में शामिल हुए थे.
मीडिया में आ रही खबरों के मुताबिक राष्ट्रीय उलेमा परिषद के प्रवक्ता तल्हा रशादी ने कहा है, यह एक सामूहिक निर्णय है कि हम उस व्यक्ति का समर्थन करेंगे जो अपने कठिन समय में जिले के लोगों के साथ खड़ा रहा है.जिले के लोगों की मांग थी कि गुड्डू जमाली जी का समर्थन किया जाए, क्योंकि उन्होंने खुद को साबित किया है. राष्ट्रीय उलेमा परिषद ने फैसला किया है कि शाह आलम उर्फ ??गुड्डू जमाली का समर्थन किया जाएगा.वहीं आजमगढ़ के लोगों में भ्रम फैलाने की कोशिश की जा रही थी. मुझे लगता है कि आज इस समर्थन के बाद यह भ्रम खत्म हो जाएगा.
राष्ट्रीय उलेमा परिषद का समर्थन मिलने के बाद जमाली ने दावा किया है कि अब उनकी जीत तय है. इसके पीछे मुख्य कारण सदर, मुबारकपुर और गोपालपुर विधानसभा सीटों पर राष्ट्रीय उलेमा परिषद का दबदबा बताया जा रहा है जो आजमगढ़ संसदीय क्षेत्र का हिस्सा हैं.2017 के यूपी विधानसभा चुनाव में, बसपा राष्ट्रीय उलमा परिषद के समर्थन से चार सीटें जीतने में सफल रही थी.
आजमगढ़ जिले में लोकसभा उपचुनाव के लिए मतदान 23 जून को होगा और इस मुकाबले में शामिल सभी राजनीतिक दल जीत के लिए कड़ी मेहनत कर रहे हैं.दो दिन पहले सपा के संस्थापक सदस्य और पूर्व विधायक राम दर्शन यादव भाजपा में शामिल हुए थे.
समाजवादी पार्टी के नेता और पूर्व मंत्री रामासरे विश्वकर्मा ने हालांकि दावा किया है कि सभी धर्मनिरपेक्ष दल सपा उम्मीदवार धर्मेंद्र यादव को विजयी बनाने के लिए समर्थन और प्रचार कर रहे हैं.समाजवादी पार्टी को राष्ट्रीय लोक दल, जनवादी पार्टी, सुहेलदेव पार्टी और कांग्रेस पार्टी का समर्थन प्राप्त है.सभी पार्टियां जो भारतीय जनता पार्टी के खिलाफ हैं, समाजवादी पार्टी के पक्ष में हैं और सपा उम्मीदवार धर्मेंद्र यादव भारी मतों से जीतेंगे.

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